व्यंग्य
मंत्री आते हैं, खाते हैं,
पीते हैं, पेपर नहीं पढ़ते हैं,
थैला लेकर खिसक जाते हैं
*कुनैन बिहारी
लेखक आते हैं, खाते हैं, पीते हैं, पेपर पढ़ते हैं और चले जाते हैं- कविता की शैली में कही गई यह स्वागत-वाणी एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि पूरी सिर चढ़ी और दम्भी राजनीति की वाणी है. यह जानना जरूरी कहाँ है कि किसने यह शुभ वाणी कही, बस यही काफी है कि यह उस राजनीतिक व्यक्ति ने कही है जो लेखकों के स्वागत के लिए वास्तविकता में जनता का सेवक है किन्तु जो दंभ में अपने को जनता का मालिक भी समझने लगा है और जनता को जनकोष से दान ढोल पीट कर देने लगा है...बोलो कितने लोगे, मेरे फैले हाथों को देखो-इतने लोगे...जितना सोचा नहीं उतना दूँगा...भिखारियो! कटोरी तो बढ़ा!
लेखकों की भूख होती तो जरूर
है लेकिन उस भूख का अहसास उन्हें अपने पेट के साइज के अनुसार ही लगता है लेकिन
बयानबाज नेता की बात करें तो कहना कितना उचित लगता है-नेता आते हैं, खाते हैं,
पीते हैं, पेपर नहीं पढ़ते हैं...हाथ में रुपयों का थैला लिए खिसक जाते हैं. ऐसे
नेताओं की भूख अजीब होती है, जिसका कोई कनेक्शन उसके पेट से नहीं होता बल्कि उसके
दिमाग से होता है, जिसकी भूख असीमित होती
है!
अंग्रेजों ने भारत को आज़ादी देते हुए उसका
राजकोष करीब-करीब खाली कर दिया था और उस जमाने में जब कोई मंत्री विदेश यात्रा पर
जाता था तो वहाँ के अखबारों में समाचार प्रकाशित होता था-भारत से एक भिखारी
बाउल(कटोरे) के साथ हमारे देश आया है! लेकिन एक दिन उसी देश के राष्ट्रपति बाउल
लेकर भारत आए. उनकी पत्नी ने
हमारे देश के छात्रों के साथ नृत्य किया. यह देश की जनता की मेहनत का परिणाम था और
देश के समर्पित नेताओं का प्रयास कि भारत एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया. लेकिन आज देश की १२५ करोड़ जनता फिर से
भिखारी हो गई है. उससे मदमत्त सरकार पूछती है- कितना लोगे...इतना लोगे...जितना
सोचा नहीं उतना दूँगा...कर्ण के प्रदेश में हजारों वर्ष बाद, कोई बड़ा दानी आया था!
राजपाठ त्याग कर दुनिया के बुद्ध बनने वाले सिद्धार्थ के प्रदेश में, कोई हिमालय पर तपस्या करनेवाला, झूठा गरीब आया था, महादानी बनकर
और दान कर शान से चला गया, जनता का कोष जनता को दान में दे गया! सबको बराबर का हक़ बाँटने
वाला अपने घर में बहुतों के मुँह सी कर आया था और बहुतों के अधिकार को कुचल कर
पहुँचा था सम्राट अशोक के प्रदेश में, यह इतिहास भुला कर कि अशोक ने पूरे देश को
चक्रवर्ती सम्राट के रूप में, अपने राज्य की जनता के कमाए हुए धन से कितना दिया था,
बिना ढोल बजाए! दानी महाराज यह भूल गए कि वे लोकतंत्र बहाल करने का झूठा नारा दे
कर, उस प्रदेश में आए थे, जहाँ
के एक जनपद वैशाली में लोकतंत्र की पहली बुनियाद पड़ी थी. चौड़ी छाती वाले उस नेता
के अपने संगठन में कितना लोकतंत्र है कि, बूढ़े नेता लोग मानसिक रूप से डेड घोषित
कर दिए गए हैं. वसे नेता जी जिनको नापसंद करते हैं उनकी वे बोलती बंद कर देते हैं
ताकि उनकी ताकत बढ़े विरोध का एक भी स्वर लोकतंत्र में सुनाई न दे. डर है कि वे सबकी जुबान के लिए सरकार की और से तालों
की व्यवस्था न कर दें
और उसकी खरीद में
सितम्बर/2015....34
कमीशन न खालें!
हमारा देश कमाल का देश है- यहाँ कभी घोषित कभी
अघोषित इमरजेंसी लगी रहती है. घोषित से अघोषित चीज बड़ा खतरा पैदा करती है और
महादानी का साम्प्रदायिक गुरु भी इस खतरे का रोना रो रहा है! अब क्या किया जाए,
उनको उनके पैतृक देश पाकिस्तान भगा दिया जाए? वैसे, महादानी के एक प्रिय चेले
महापंडित गिरिराज हैं जो जरूरत से ज्यादा ही शरीफ जुबान रखते है और चाहते हैं कि
कबीर पाकिस्तान पलायन कर जाएँ! अशफाक उल्लाह खान पाकिस्तान पलायन कर जाएँ! मल्लिक
मोहम्मद जायसी पाकिस्तान चले जाएँ. बादशाह जफर को म्यामार की कब्र से पाकिस्तान
पहुँचा दिया जाए. महापंडित गिरिराज यानी पहाड़ों के राजा यानी देवी पार्वती के वंशज
हैं कि नहीं यह तो नहीं जानता, लेकिन यह जनता हूँ कि एक महापंडित था जो बाद में
राक्षस रावण के नाम से जाना गया....वैसे महापंदित हैं बड़े तगड़े वक्ता. धून रहे हैं
समाज के एक वर्ग को और धूने चले जा रहे
हैं-बोलो और कितना लोगे, मेरे फैले हाथ को देखो, इतना लोगे, जितना सोचा नहीं उतना
दूँगा....और देने-दाने के बाद भी समाज में विवाद पैदा नहीं हो रहा यह उनके लिए
चिता का विषय है. सो, भागलपुर जाकर उसकी बुनियाद खड़ी करने की कोशिश की लेकिन विफल
हो कर लौटे. कोई भी सूखे से त्रस्त व्यक्ति गर्मी से तपती धरती पर खून की नदी
बहाने के लिए तैयार नहीं था और इधर महादानी जी सांप्रदायिक लहर पैदा करेने में
विफल रहने के लिए महापंडित को गालियाँ दे रहे थे. और उनसे पूछ रहे थे-कितने लोगे,
इतने लोगे, उतने लोगे और कब कुछ साम्प्रदायिक राग गाओगे और चुनाव में अपने पक्ष की
बयार बहाओगे या फिर दिल्ली की याद दिलाओगे? बिहारी तेरा डीएनए ही खराब!
महादानी का झूठ सच होता है, जनता का सच जमीन
से सौ फुट नीचे गाड़ दिया जाता है. जनता को अपने मन की बातें दिल में दफ़न करनी पड़ती
है और कामधाम छोड़ कर महादानी की के मन को सुनना हीपड़ता है, जो न सुने उसे
पाकिस्तान का पासपोर्ट और वीसा तैयार मिलता है. महादानी और उनके अतिसमर्थ चेलों के
अनुसार, पाकिस्तान ही वह देश है जहाँ जागे हुए भारतवासियों की जगह है और सोए हुए
भारतीय राग अलाप रहे हैं- जाहे विधि राखे दानी ताहे विधि रहिए! अब ऐसा भजन गानेवाले
के लिए राजा कोई भी हो उसे तो सिर्फ अपने जीवन और अपनी रोटी के लिए संघर्ष करना है
और वे करते चले जा रहे हैं. एक साल पहले तक इनमें जो चार रोटियाँ, सब्जी और दाल पा
रहे थे, महादानी जी के मन की बात सुन कर रोटियाँ. सब्जी और दाल बचा रहे हैं!
महादानी प्रसन्न हैं और अगली विदेश यात्रा के लिए जुमले और सपने अपने महा किचेन
में बनवा रहे हैं-एक ओर उनके वेल पेड स्पेशल रसोइये असली घी में तर भोजन बना रहे
हैं तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता की हांडी में विशेषज्ञ लोग भिड़े हुए हैं. महादानी
साहेब की डांट खा रहे हैं लेकिन साम्प्रदायिता की दाल गलती नजर नहीं आ रही.
महादानी की आँखों से नींद हवा हो गयी है और प्रतिष्ठा दाँव पर लग गयी है. फिर क्या
था उनका विशाल दिमाग कुछ नया सोचने लगा- हरे रंग को दो भागों में बाँट दो, गोपालकों
को दो भाग में बाँट दो, निचले पादान के लोगों को दो भाग में बाँट दो, जहाँ- जहाँ समाज
बाँटने से लाभ जो वहाँ-वहाँ समाज बाँट दो. खूब वैमस्यता फैलाओ और कोवेशी को लाओ,
कठोर को लाओ और सबको लाने का जिम्मा जेबीआइ को सौंपो. और लो हरे रंग को बांटने के
लिए कोवेशी भी पधार गए और कठोर भी मुलायम बन कर कठपुतली हो गए...
आज के महासेवक का कीचन बहुत ही विशाल है. यहाँ
सर्वोत्तम स्वर्ण भस्म युक्त भोजन के अलावा गुप्त कैबिनेट भी बनाया जाता है और असली
मंत्रियों की जगह इसी गुप्त कैबिनेट के मंत्री काम करते हैं. इसी किचन में सेवा देने
वालों की लिस्ट पकाई जाती है. इसी किचेन में सारी नीतियाँ पकती हैं.हाथी के दिखाने के दांत और खाने दांत अलग-अलग
ऐसे ही नहीं होते. अब देखना है कि हाथी के खाने वाले दांत क्या-क्या हजम कर देश को
किस ऊँचाई से गिराते हैं!
सितम्बर/2015....35
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